google-site-verification=dALbhPQRfhM_3Hl6SH_6JxEBMMslI_Ih-VtFsyxFdpU मकर संक्रांति पर धरती माता की कहानी || Dharti Mata ki Kahani in hindi - Motivation Stories

मकर संक्रांति पर धरती माता की कहानी || Dharti Mata ki Kahani in hindi

 

मकर संक्रांति पर धरती माता की कहानी || Dharti Mata ki Kahani in hindi

 

मकर संक्रांति पर धरती माता की कहानी

 

मकर संक्रांति, हिन्दी पंचांग में मकर राशि में सूर्य का प्रवेश के दिन को कहा जाता है। इस मौके पर, धरती माता के एक प्रमुख कथा है जिससे हमें अनेक महत्वपूर्ण सिखें मिलती हैं। यह कथा है महाभारत की कथा में से एक, जिसमें शान्तनु राजा और गंगा देवी के पुत्र भीष्म पितामह की उत्पत्ति है।

कथा के अनुसार, राजा शान्तनु ने गंगा देवी से प्यार किया और उन्हें अपनी पत्नी बनाने की इच्छा की। गंगा देवी ने स्वीकार किया, लेकिन एक शर्त रखी कि जब भी उनके गर्भ से बच्चा पैदा होगा, उसे वह सीधे गंगा नदी में प्रवाहित कर देगी।

शान्तनु और गंगा देवी के साथ जीवन बिताते हुए, एक दिन गंगा देवी ने अपने सात पुत्रों को पैदा किया, लेकिए वह सभी पुत्रों को सीधे गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। शान्तनु ने एक एक करके अपने पुत्रों को बचाया, लेकिए जब गंगा नदी ने आठवां पुत्र पैदा किया, शान्तनु ने रुकावट डाली और पूछा कि वह क्यों ऐसा कर रही हैं। गंगा देवी ने उस पुत्र को आत्मा का शिक्षा देने का उद्देश्य बताया और फिर वह चली गई।

इस पुत्र को भीष्म कहा गया, और उन्होंने अपने पिता की राजधानी का भरपूर समर्थन किया और बहुत बड़े योद्धा बने। उन्होंने महाभारत के युद्ध में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपने अद्भुत ब्रह्मचर्य के लिए प्रसिद्ध हुए।

इस कथा से हमें यह सिखने को मिलता है कि जीवन के विभिन्न पहलुओं को स्वीकार करना और उनसे सीखना हमें बड़े और समर्थन शील बना सकता है। मकर संक्रांति का अवसर हमें इसी सार्थक और प्रेरणादायक कथा को याद करने का मौका प्रदान करता है।

 

धरती माता की कथा

 

धरती माता की कथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत में महत्वपूर्ण है। इस कथा में धरती को माता बनाया गया है जो हमारी सभी जीवों की माता है और हमें अपनी सृष्टि में सुरक्षित रखती है। यह कथा वेदों, पुराणों, और विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में प्रचलित है।

कथा के अनुसार, एक समय की बात है जब देवता और असुर मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे। मंथन के परिणामस्वरूप हजारों वर्षों तक निकलने वाले विषाणु आये, जो एक असुर ने छुपाकर रखा था। विषाणु को देखकर असुरों ने उसे हरण कर लिया और समुद्र में छुपा दिया।

देवता और असुर मंथन करते रहे, लेकिन विषाणु के हारने से उन्हें अमृत मिलने का सम्भावना थी। इस समय भगवान विष्णु ने वमन रूप धारण किया और देवता की सेना के साथ युद्ध के लिए असुरों के समक्ष आगे बढ़ा। वमन भगवान विष्णु के बहुत्व की वजह से वह सम्पूर्ण भूमंडल को एक कदम में धरती पर स्थानित कर दिया।

इसके बाद, वमन ने देवता को वर मांगने के लिए कहा और उन्होंने देवता की सेना को अमृत पिने से रोक दिया। इसके बाद, भगवान विष्णु ने विषाणु रूप में पुनः प्रकट होकर देवता को अमृत की प्राप्ति की अनुमति दी और उन्हें असुरों के शिकम में से मुक्त किया।

इस कथा से हमें यह सिखने को मिलता है कि धरती माता हमारी सुरक्षा करने वाली माता है और भगवान विष्णु का अवतार होने के कारण हमें अमृत मिला है जो हमें नित्य जीवन के लिए अनुग्रहित करता है।

 

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